I choose......
- International Healers Association
- 5 days ago
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Updated: 3 days ago
(Article In English, then in Hindi Language. )

Awakening is not a destination or a purpose. The strongest illusion on Earth is division and separation. It is through creating divisions and separations in beliefs, thoughts, and perceptions about everything around us, that one moves away from awakening and dives deeper into illusion.
These very divisions cause a desire to become deeply attached to things and people who are similar to us in thinking and behavior, or we become averse to those who do not share similar thoughts and behaviors.
When we come across like-minded others, we deepen our attachment, love, fondness, and liking. This leads to living with more cravings, of constantly seeking people who are more like us.
When we come across those who are not similar to us, we deepen our aversion, hatred, anger, and disappointment. This causes us to live with more fear and aversion, constantly worrying about encountering those who differ from us.
Both cravings and aversions cause deterioration in one’s awakening and move us away from our core energies, our origin.
If we notice the world today, we see that we have been divided by several concepts: gender (more than two genders), religion (which religion is “more true”), status and money (rich vs. underprivileged), jobs (competition and lack of opportunities), healthcare (vaccinated or not; belief in one type of medicine, treatment, or professional over another), food (which food is correct or harmful, what is poisonous or original), water (contaminated or pure), air (chemtrailed, polluted, weather-affected, or something else), Energies, Entities (Believing or not believing in Dark and Light energies), Beyond Earth ( Believing or not believing in Planets and other Planetary beings) and the list goes on.
We have people who support one thought over another, and the truth is: both of them are right.
Shocked?
What you hold deeply within and believe in becomes part of your real world. So yes, everything is eventually an illusion, but when one holds strong beliefs and thoughts, we become rigid in tightly holding these illusions, because we begin to see them as our reality.
So now the question is: why are we allowing this to happen to ourselves?
The answer is simple, lack of awakening, and becoming more attached to the outside world instead of going within, into stillness for a while. It is only in stillness that illusions begin to dissolve.
A person who goes within awakens; a person who attends only to the outside descends into illusion and keeps getting entangled in their own illusory creations, from one birth to the next, in different forms.
Just knowing this concept is not enough to dissolve all illusions. If one is still caught in these illusory creations around us, it is through inner work, choosing to rest more in stillness, that the path to liberation, to nothingness, eventually opens.
We have all been playing these illusionary games on Earth and beyond for eras and yugas. We can blame the media , THEM or the masses for keeping us entangled, but it is only the “I” that chooses to focus on the outside.
What are you choosing?
Do you still have questions, that if everything is an Illusion, why are we still here ? When and how did the first Illusion begin?
The Ans : Till you have a question within you you shall remain a part of Illusions, rather keep creating more illusions with every answer you receive.
Meanwhile I leave you with a Rhetorical question and a Video below, When everything is an Illusion, is there actually a Beginning or an End ?
May all be blessed!
In Hindi ( the entire article)
जागरण (Awakening) कोई गंतव्य या उद्देश्य नहीं है।
पृथ्वी पर सबसे बड़ी माया विभाजन और अलगाव है।
जब हम अपने आसपास की हर चीज़ के बारे में विश्वासों, विचारों और धारणाओं में विभाजन और अलगाव पैदा करते हैं, तभी हम जागरण से दूर होकर माया में और गहराई तक डूब जाते हैं।
इन्हीं विभाजनों के कारण हम उन वस्तुओं और लोगों के प्रति गहरी आसक्ति पैदा करते हैं, जो हमारी सोच और व्यवहार से मिलते-जुलते हैं, या फिर उनसे विरक्ति जब वे हमसे भिन्न होते हैं।
जब हमें हमारे जैसे विचार वाले लोग मिलते हैं, तो हम आसक्ति, प्रेम, लगाव और पसंद को और गहरा करते जाते हैं। इससे और अधिक लालसाएँ जन्म लेती हैं, हम निरंतर ऐसे लोगों को खोजने लगते हैं जो हमारे जैसे हों।
और जब हमें भिन्न विचारों वाले लोग मिलते हैं, तो हम विरक्ति, घृणा, क्रोध और निराशा को और गहरा कर लेते हैं। इससे भय और विरोध बढ़ता है, हम लगातार चिंतित रहते हैं कि कहीं ऐसे लोग फिर न मिल जाएँ जो हम जैसे नहीं हैं।
लालसा और विरक्ति, दोनों ही जागरण को क्षीण करती हैं और हमें हमारे मूल ऊर्जा, हमारे उद्गम (origin) से दूर ले जाती हैं।
यदि हम आज की दुनिया को देखें, तो हम अनेक अवधारणाओं के आधार पर विभाजित हैं,
लिंग (दो से अधिक),
धर्म (कौन-सा धर्म “ज़्यादा सत्य”),
स्थिति और धन (अमीर बनाम वंचित),
नौकरियाँ (प्रतिस्पर्धा और अभाव),
स्वास्थ्य (वैक्सिन लिया या नहीं, कौन-सा उपचार या चिकित्सा श्रेष्ठ),
भोजन (कौन-सा भोजन सही या हानिकारक, क्या विषैला है और क्या मूल),
जल (दूषित या शुद्ध),
वायु (केमट्रेल, प्रदूषण, मौसम-प्रभावित या कुछ और),
ऊर्जाएँ, एंटिटीज़ (डार्क/लाइट ऊर्जा में विश्वास या अविश्वास),
पृथ्वी से परे (ग्रहों और अन्य ग्रह-ऊर्जाओं में विश्वास या अविश्वास)…
और सूची लंबी होती जाती है।
हमारी दुनिया ऐसे लोगों से भरी है जो एक विचार का समर्थन करते हैं और दूसरे का विरोध, और सच यह है: दोनों ही सही हैं।
चौंक गए?
जिसे आप भीतर से गहराई से पकड़ते हैं, जिसमें आप विश्वास करते हैं, वही आपकी वास्तविक दुनिया का हिस्सा बन जाता है।
तो हाँ, सब कुछ अंततः माया है,
लेकिन जब कोई व्यक्ति अपने विश्वासों और विचारों को बहुत कड़ा पकड़ लेता है, वह उन मायाओं को अपनी वास्तविकता मानने लगता है।
अब प्रश्न यह है: हम अपने साथ ऐसा होने क्यों दे रहे हैं?
उत्तर सरल है:
जागरण का अभाव,
और बाहर की दुनिया से अधिक जुड़ जाना,
बजाय कुछ समय भीतर जाकर स्थिरता में ठहरने के।
केवल स्थिरता में ही माया घुलना शुरू होती है।
जो भीतर जाता है, वह जागृत होता है।
जो केवल बाहर को देखता है, वह माया में उतरता जाता है और अपनी ही बनाई मायाओं में जन्म दर जन्म उलझता रहता है।
सिर्फ इस सिद्धांत को जान लेना ही माया को मिटाने के लिए पर्याप्त नहीं है।
यदि कोई अभी भी इन मायिक रचनाओं में उलझा हुआ है, तो भीतर के कार्य,
अधिक स्थिरता में विश्राम,
ही धीरे-धीरे मुक्ति,शून्यता, की राह खोलते हैं।
युगों और कालों से हमने पृथ्वी पर और पृथ्वी से परे ये मायिक खेल खेले हैं।
हम मीडिया, “उनको” या भीड़ को दोष दे सकते हैं,
लेकिन अंत में केवल “मैं” ही तय करता है कि ध्यान बाहर रखना है या भीतर।
आप क्या चुन रहे हैं?
क्या अभी भी आपके भीतर यह प्रश्न है कि,
यदि सब कुछ माया है, तो हम यहाँ क्यों हैं? प्रथम माया कब और कैसे प्रारंभ हुई?
उत्तर:
जब तक आपके भीतर प्रश्न है,
आप माया का हिस्सा बने रहेंगे,
बल्कि हर उत्तर के साथ नई मायाएँ रचते रहेंगे।
अंत में, मैं आपको एक प्रश्न और नीचे दिए गए वीडियो के साथ छोड़ता/छोड़ती हूँ,
जब सब कुछ माया है, तो क्या वास्तव में कोई शुरुआत या अंत है?
सभी पर कृपा बनी रहे। सबका मंगल हो।
🙏🪷🕉️
डॉ रेनूका गुप्ता


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